‘ट’ का ट्रेंड

‘ट’ का ट्रेंड

टुनटुन का टकबक-टकबक करता घोड़ा, उसकी टाप और उसका टापते रहना... टमटम पर सवार होकर निकली टोनू, आईस्क्रीम वाले की टनटन पर दौड़ पड़ता टॉमी और टिमटिमाते तारे देख ट्विंकल-ट्विंकल लिटिल स्टार कह पड़ता टिंकू, ....ये ट्विन्स जब बड़े हुए तो टॉमी भी टाइगर हो गया और टॉफ़ी खाने वाले सब टिप-टॉप रहने लगे। सूरज तो अब भी आसमान में टँगा था लेकिन अब उसे टकटकी लगाकर देखने की फुर्सत किसी के पास नहीं रही गोकि जीवन टंटा हो गया और कभी साथ समय बिताने वाले अब कभी आपस में टकरा भी गए तो तुरंत टाटा-बाय-बाय होने लगा। टेनिस की गेंद किस पाले में गिरेगी पूरा जीवन ऐसे ही उलझ गया।

टहलता ‘ट’

इस ‘ट’ का ट्रेंड एकदम हटकर है। इसमें बड़े ट्विस्ट हैं। भाषा विज्ञान ने ‘ट’ वर्ग के इस प्रथम व्यंजन को मूर्धन्य, स्पर्श, अघोष तथा अल्पप्राण कहा है। इसे टटोलने बैठें तो इसकी टंकार सुन कई शब्द टनेल से निकलकर आ गए जैसे वे मन की टहनी पर पहले से ही टँके और टँगे थे। टिड्डियों की क्या मजाल कि उन्हें खा जाएँ। टरपेंटाइन डाल उन्हें टर्मिनेट करने की ‘दो टूक बात’ और ‘टका-सा जवाब’ भी इस ‘ट’ के पास है तो ‘टके सेर भाजी, टके सेर खाजा’...वाली कहावत भी। अपना टर्न आने पर जैसे टंकी से पानी टपकता है वैसे टहलता हुआ ‘ट’ आ जाता है। टालमटोल करने वाले भी फिर इसे टाल नहीं सकते। पूरे टाउन में यह अपने टाइटिल का टाइमटेबल टाइप करवा जाता है।

‘ट’ का टीका

टिकट लेकर टोक्यो जाने और टेलरमेड सूट-टाई पहनकर आने वाले बड़ा टिपिकल व्यवहार करते हैं। टैक्नोलॉजी के बाशिंदे टेबल पर लगा खाना ही खाते हैं। याकि ट्रे में सर्व हो तभी खाते हैं। उन पर कैसे ट्रस्ट कर सकते हैं जबकि वे ट्रैफ़िक को देख कोफ़्त खाते हैं, ट्रांसफ़र कर देने की धमकी देते हैं। वाशिंग बार को कपड़े धोने की टिकिया कह दो तो उसे समझना उन्हें ‘टेढ़ी खीर’ लगता है। उन्हें रुमाल नहीं, टिशू पेपर लगता है, मानो वे किसी और ही टापू से आए हों। लकड़ी की टाल पर काम करने वालों को देख वे ‘टें-टें’ करती टिप्पणी कर दें तो यह ऐसे टुच्चे लोगों को अपनी टाँगों पर चलकर लौट जाने का रास्ता दिखा देता है। यह उन्हें टीबी-टाइफ़ाइड का डर दिखाता है। फिर तो वे न केवल टमाटर का सूप पीना पसंद कर लेते हैं बल्कि टिंडे को भी आलू-टिक्की-टिक्कड़ मान खा लेते हैं। इसका टीका करवा लिया तो ‘टाँय-टाँय फिस’ हो ही नहीं सकती।

‘ट’ का टिकाव

‘ट’ का टिकाव लंबा टिका रहता है। इससे टीवी है और टीआरपी है, टीडीआर, टेंडर है। उनकी टेर लगाते लोग हैं तो उसे टेर देते लोग भी। नए-नए टूथपेस्ट आज़माने वालों के विपरीत कुछ लोग हैं, जिन्हें टूथपाउडर भी नसीब नहीं होता। जो पूरी तरह टूट जाते हैं, टूटी-बिखरी ज़िंदगी में जिन्हें सुख के दो टुकड़े भी नहीं मिल पाते, जो टिमटिमाती रोशनी में टेंट में टेंशन में जीते हैं, उन्हें रोशनी की टेक लगाते टीचर्स भी इसी से हैं। कुछ के लिए जीवन टैस्ट है तो कुछ के लिए टैस्ट मैच देखने की लक्ज़री मतलब जीवन है। टेंपो-टैक्सी में बैठ टेकड़ी-टीले पर टेलिस्कोप ले जाने वाले टूरिस्ट भी इसी से हैं। तो कहीं न जा दिनभर टेलीफ़ोन से चिपके रहने वाले लोग भी। टेलिकम्युनिकेशन अच्छा है लेकिन थोड़ी देर खुले आकाश में घूमना, थोड़ी टैनिंग हो जाना भी बुरा नहीं है। यह टॉपिक कोई ट्रंककॉल या टेलिग्राम तो है नहीं कि बंद हो जाए, ‘ट’ का टेलिप्रिंटर पर आता संदेश तो बड़ा लंबा है।

टेस्टिमोनियल

टॉलस्टॉय जैसे महान् लेखक भी इससे हैं और महान् लोगों से मिलने वाली टोलरेंस की सीख भी इसीसे है। टोकरियाँ भी इससे हैं और टोलियाँ भी। बस किसी को कभी टोपी न पहनाइएगा, ‘टोपी पहनाने’ की कहावत पता है न आपको। और टोने-टोटके तो बिल्कुल न कीजिएगा। टोटल बात यह है कि ट्यूबलाइट में बैठिए, चाहे कुएँ का या ट्यूबवैल का ठंडा पानी पीजिए और अब आपका टेस्टिमोनियल बताइए कि इसे लेकर आप क्या सोचते हैं? पूरा ट्रक भरकर ट आ गया है, अब आपको इसके लिए किसी ट्यूटर की ज़रूरत नहीं होगी। ट की ट्रांसपरेंसी समझ ली तो इसका ट्रैक्टर और ट्रॉली आपको भी पसंद आ जाएगा। आप टोकन देकर कहेंगे इसकी ट्रेज़री तो हमें ही चाहिए, फिर कोई ट्रेजडी ही नहीं रहेगी।