मुनिया की दुनिया

मुनिया की दुनिया

इसकी असली रचयिता है मुनिया की माया… कोशिश केवल उसे शब्द देने वाली हमारी छाया

किस्सा 1

सामने के घर में रहती है बमुश्किल तीन साल की मुनिया…कभी-भी हलकी बयार-सी आती है। बाकायदा पूछती है- मी आत येऊ (मैं अंदर आऊँ), आपके जवाब को हामी ही मानते हुए बिना इंतज़ार वह अंदर भी आ जाती है। उसकी अपनी दुनिया है, उसमें आप है, आपकी बातों के उसके अपने जवाब हैं…आपको लाजवाब करते हुए।

आज आई..तो मैं उसे उसके जन्म के समय की कोई घटना सुनाने लगी…

मुनिया- क्या जब मैं बॉर्न हुई थी, तब की बात है..

मैं- हाँ, जब तुम बॉर्न हुई थी..

मुनिया- पर उससे पहले तो आप बॉर्न हुई होंगी

मैं- हाँ…पर वो तो सालों पहले..

मुनिया- पर मेरे बॉर्न होने के पहले तो मेरी दीदिया बॉर्न हुई

मैं- हाँ

मुनिया- उससे पहले यह..वह..वह…वह…

तो किस्सा यह कि मुनिया के बॉर्न होने से पहले और कौन बॉर्न हुआ, और उससे पहले कौन, उससे पहले कौन…की रेल चल पड़ी है…जब वह रुकेगी तब तक मैं भूल जाऊँगी कि मैं क्या कह रही थी…इसे कहते है चकरघिन्नी..पर बड़ी प्यारी वाली

(क्रमशः)

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