इस कठिन दौर में बदलें जिंदगी जीने का तरीका

इस कठिन दौर में बदलें जिंदगी जीने का तरीका

कोरोना, लॉकडाउन, मौत का डर.. इन सब बातों ने बीते कुछ महीनों में सबसे ज्यादा तकलीफ आर्थिक रूप से पहुंचाई है। कई लोगों का मानना है कि इससे अमीरों को कोई खास फर्क नहीं पड़ा और गरीबों की मदद सरकार कर रही है। सबसे ज्यादा दिक्कत में आये मिडिल क्लास लोग, जो न सड़कों पर निकल कर भीख मांगने की स्थिति में होते हैं और न इतने अमीर की घर बैठे कुछ महीने खा सकें। घर के लोन की किश्त, मेडिकल इंश्योरेंस की किश्त, बच्चों के स्कूल की फीस, किराना, पेट्रोल, फोन बिल, बिजली बिल, गैस, घर में बुजुर्ग हों तो उनकी दवाईयां…आदि। इन सभी खर्चों को हर महीने उठा पाना बीते कुछ महीनों में काफी मुश्किल भरा रहा।

शुरूआती दिनों में तो लोगों ने अपनी थोड़ी बहुत सेविंग से घर चला लिया, लेकिन अब काफी दिन हो गये हैं और गाड़ी अभी भी पटरी पर नहीं आयी है। किसी की नौकरी चली गयी है, तो किसी की सैलरी आधी हो गयी है। बिजनेस भी ठप्प पड़े हैं। ऐसे में गलत कदम उठाने से बेहतर है कि खुद को संभालें और थोड़ी सूझबूझ से इन परिस्थितियों का सामना करें।

एक बात और यह कि इस पूरे मामले को एक सबक के रूप में लें और भविष्य के लिए कुछ अच्छी आदतें अपनाएं

१ बचत की आदत डालें

अपनी सैलरी का एक चौथाई हिस्सा बचाकर अलग रखें। बाकि ७५ परसेंट रुपयों को देख कर सोचें कि आपकी सैलरी ही इतनी है और इसी में घर चलाना है। एक चौथाई न हो सकें, तो कुछ कम सही, लेकिन सैलरी का कुछ हिस्सा अलग निकाल कर रखें। इस तरह अपने पास इतने रुपये जमा जरूर करें कि यदि ऐसी परिस्थिति फिर कभी आये, तो कम से कम 5 महीने आपके बिना कमाई के निकल सकें।

गुल्लक भी जरूर बनाएं। ये सिर्फ बच्चों के लिए नहीं, बल्कि बड़ों के लिए भी जरूरी है। १०० , ५०० और २००० रुपये। इस तरह रुपये के मुताबिक अलग-अलग या एक कॉमन गुल्लक बनाएं और जब भी सैलरी हाथ आये, इनमें रुपये डालें। बचत का ये तरीका काफी कारगर है।

२ फिजूलखर्च कम करें

अक्सर सोशल साइट्स पर घूमते-फिरते प्रोडक्ट्स के विज्ञापन दिखने से हम उस सेक्शन में चले जाते हैं और जरूरत न होने के बावजूद शॉपिंग कर लेते हैं। कभी कोई सुंदर ड्रेस पसंद आ जाती है, तो कभी नेकलेस। हम तुरंत खरीद लेते हैं कि कभी बाहर जायेंगे, तो इसे पहनेंगे। लेकिन अक्सर ये ड्रेसेज यूं ही महीनों तक पड़ी रह जाती हैं। इसे कहते हैं फिजूल खर्च।

हम स्टोर्स में जाकर भी यही गलती करते हैं। ढेर सारा सामान अपनी बास्केट में डालते जाते हैं और जब काउंटर पर बिल बन कर सामने आता है, तो लगता है कि यह कुछ ज्यादा हो गया, लेकिन फिर हम ये सोचकर सामान कम नहीं करते कि लोग क्या कहेंगे। अपनी ऐसी आदतों को बदलें। ब्रांडेड कपड़े पहनना, रेस्तरां में खाना, मॉल और मल्टीप्लेक्स में जाना अच्छी बात है, लेकिन हर हफ्ते, हर तीसरे तीन यह करना ठीक नहीं। इस पर कंट्रोल करें। इन चीजों के बगैर ज़िंदगी कट सकती है।

३ 'सोना' ऐसे वक्त के लिए ही है

ऐसे कई लोग हैं, जो वैसे तो सोना यह सोच कर ही खरीदते और जमा करते हैं कि बुरे वक्त में सोना काम आयेगा, लेकिन जब सच में बुरा वक्त आता है और घर की महिला खुद कह रही है कि सोना बेच देते हैं, तो सोने को बेचने के बजाय इस बात को इगो से जोड़ लेते हैं कि घर की महिला के सोने बिकने नहीं देंगे, भले ही जान दे देंगे। ऐसी बात बेवकूफी भरी है, खासकर तब जब आप सचमुच परेशानी में हों। याद रखें कि आप जिंदा रहेंगे तो पत्नी, मां को और सोने की गहने बना देंगे। अभी उन्हें गहनों से ज्यादा आपकी जरूरत है। बुरे समय में जान देने जैसी बात सोचने के बजाय ऐसी इन्वेस्टमेंट का लाभ उठाएं

४ थोड़ा पॉजीटिव होकर सोचें

यदि आपकी सैलरी कम हुई है तो भगवान को शुक्रिया कहें क्योंकि कम से कम सैलरी तो है। अगर नौकरी चली गयी है तो इस बात का शुक्र मना लें कि कम से कम बीमारी से जान तो बच गयी। कहने का अर्थ यह है कि हर परिस्थिति में पॉजिटिव एंगल सोचें। इस बात को समझें कि कई लोग आम दिनों में भी 10 हजार रुपये में घर चलाते हैं आपको बस अपने खर्च पर ध्यान देना होगा।

५ किसी भी काम को छोटा न समझें

अगर आपको पिछली नौकरी में ३५ या ५० हजार मिलते थे तो जरूरी नहीं कि दूसरी नौकरी तलाशने पर भी आपको इतने रुपये ही मिलेंगे। अभी हर तरफ नौकरी का संकट है। बेरोजगार रहने से बेहतर है कि कम सैलरी की नौकरी कर लें। इसे इगो से न जोड़ें। ये न सोचेें कि मैं फलां कंपनी में बॉस था और अब ऐसे काम करूंगा? याद रखें, आपसे टैलेंटेड लोग घर पर बेकार बैठे हैं। और अगर नौकरी नहीं करनी, तो कोई बिजनेस करें। भले ही छोटे से शुरुआत करें। इसमें भी यह न सोचें कि लोग क्या कहेंगे ‘फलां कंपनी का बॉस अब इस चीज की दुकान चला रहा है’। क्योंकि लोग आपके घर राशन भरने, फीस भरने नहीं आने वाले हैं।

६ बच्चों को भी आदत डालें

बच्चे जो भी मांगे, हर चीज खरीद कर देने की जरूरत नहीं। उन्हें भी कमी के अहसास को समझने दें। आज सभी पेरेंट चाहते हैं कि बच्चा बड़े से बड़े स्कूल में जाये, लेकिन अगर आप चाहें तो अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भी डाल सकते हैं। आज भी अच्छे सरकारी स्कूल मौजूद हैं। आपको बस नजरिया बदलना होगा। हिंदी मीडियम फिल्म को याद करें। जब तक आप अपने बच्चों को इसमें एडमिशन नहीं दिलायेंगे, इनकी स्थिति नहीं सुधरेगी। आज कई बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ कर देश का नाम रौशन कर रहे हैं। इस बात को समझें कि जिसे पढ़ना होता है, वह सरकारी स्कूल में पढ़ कर भी स्टेट में टॉप कर सकता है और जिसे नहीं पढ़ना होता, वह कितने भी बड़े स्कूल में चला जाये, फेल ही होगा। अगर आपकी नौकरी ना रहे या सैलरी कम हो जाये तो बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ने भेज सकते हैं। ये न सोचें कि लोग क्या कहेंगे। हो सकता है शुरू में आपको व बच्चों को अजीब लगे लेकिन बाद में सब नॉर्मल लगेगा। बच्चों को भी जिंदगी के उतार-चढ़ाव समझने का मौका दें

वक़्त हमेशा एक सा नहीं होता। कुछ आदते बदलकर भी आप एक बेहतर जिंदगी जी सकते है। जीवन में कुछ भी असंभव नहीं है, और यदि कुछ है तो वह आपकी सोच में है। अगर आपकी सोच सही है तो आप निश्चित ही इस कठिन दौर से आसानी से निकल जाएंगे। अंत में यह कहना उचित होगा कि,"थोड़ी सी समझदारी, कम करेगी परेशानी"